(वैज्ञानिक, खगोलीय और शास्त्रीय दृष्टि से पूरी व्याख्या)
मकर संक्रांति भारत के उन गिने-चुने पर्वों में से है जो हर साल लगभग एक ही तारीख को आते हैं। आमतौर पर यह पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता है। लेकिन लोगों के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि—
जब अधिकतर हिंदू त्योहार चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं, तो मकर संक्रांति हर साल 14 जनवरी को ही क्यों होती है?
और
कभी-कभी यह 15 जनवरी को क्यों पड़ जाती है?
इस लेख में हम मकर संक्रांति की तारीख से जुड़ी खगोलीय (Astronomical), पंचांगीय (Calendar), और धार्मिक (Shastriya) व्याख्या को विस्तार से समझेंगे।
मकर संक्रांति क्या है? (संक्षिप्त परिचय)
मकर संक्रांति वह दिन है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है।
इसे सूर्य का उत्तरायण होना भी कहा जाता है।
- मकर = मकर राशि (Capricorn)
- संक्रांति = सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश
👉 यानी मकर संक्रांति सूर्य की गति से जुड़ा हुआ पर्व है।
मकर संक्रांति चंद्र नहीं, सौर पर्व क्यों है?
भारत में अधिकतर त्योहार—
जैसे दीवाली, होली, नवरात्रि, ईद—
चंद्र कैलेंडर (Lunar Calendar) पर आधारित होते हैं।
लेकिन मकर संक्रांति अलग है।
मकर संक्रांति किस कैलेंडर पर आधारित है?
✔ सौर कैलेंडर (Solar Calendar)
✔ यानी सूर्य की वास्तविक स्थिति पर आधारित
इसका मतलब:
- चंद्रमा की तिथि, अमावस्या या पूर्णिमा का इसमें कोई सीधा रोल नहीं
- केवल यह देखा जाता है कि सूर्य कब मकर राशि में प्रवेश करता है
इसी कारण मकर संक्रांति की तारीख लगभग स्थिर रहती है।
14 जनवरी को ही मकर संक्रांति क्यों आती है?
अब असली कारण समझते हैं।
1. पृथ्वी का सौर वर्ष कितना होता है?
पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा करती है:
- **365 दिन
- 5 घंटे
- 48 मिनट
- 46 सेकंड**
इसे कहते हैं Tropical Year (सौर वर्ष)
लेकिन हमारे सामान्य कैलेंडर में:
- 365 दिन (सामान्य वर्ष)
- 366 दिन (लीप ईयर)
👉 यानी हर साल लगभग 6 घंटे का अंतर रह जाता है।
2. सूर्य का राशि परिवर्तन धीरे-धीरे देर से होता है
क्योंकि:
- असली सौर वर्ष = 365.24 दिन
- कैलेंडर वर्ष = 365 या 366 दिन
इस कारण:
- सूर्य हर साल मकर राशि में थोड़ा देर से प्रवेश करता है
- यह अंतर धीरे-धीरे जुड़ता रहता है
लेकिन लीप ईयर (हर 4 साल में) इस अंतर को काफी हद तक संतुलित कर देता है।
इसी संतुलन की वजह से:
👉 मकर संक्रांति ज्यादातर 14 जनवरी को ही रहती है
फिर 15 जनवरी को मकर संक्रांति क्यों पड़ जाती है?
अब सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल 👇
जब सूर्य 14 जनवरी की रात मकर में प्रवेश करता है
अगर किसी वर्ष:
- सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
- 14 जनवरी की रात 12 बजे के बाद होता है
तो:
- धार्मिक पंचांग के अनुसार
- संक्रांति अगले दिन यानी 15 जनवरी को मानी जाती है
यानी:
तारीख नहीं, सूर्य का वास्तविक प्रवेश समय निर्णायक होता है।
क्या मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को ही रहेगी?
नहीं।
यह एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है।
दीर्घकालिक खगोलीय प्रभाव (Ayanansh)
भारतीय ज्योतिष में एक अवधारणा है:
- अयनांश (Ayanansh)
- यानी पृथ्वी की धुरी का धीरे-धीरे झुकना (Precession)
इसके कारण:
- हजारों वर्षों में
- सूर्य की राशि स्थिति आगे खिसकती जाती है
भविष्य में क्या होगा?
- आने वाले कई सौ सालों में
- मकर संक्रांति 15 जनवरी पर ज्यादा बार पड़ने लगेगी
- हजारों साल बाद यह फरवरी तक भी जा सकती है
इसी कारण प्राचीन ग्रंथों में अयन परिवर्तन की चर्चा मिलती है।
शास्त्रों में मकर संक्रांति का महत्व
1. उत्तरायण को देवताओं का दिन
हिंदू शास्त्रों में:
- उत्तरायण = देवताओं का दिन
- दक्षिणायन = देवताओं की रात्रि
इसी कारण:
- मकर संक्रांति को अत्यंत शुभ माना गया
- दान, स्नान, जप और तप का विशेष महत्व है
2. भीष्म पितामह का उदाहरण
महाभारत में:
- भीष्म पितामह ने
- उत्तरायण की प्रतीक्षा कर शरीर त्याग किया
इससे उत्तरायण (मकर संक्रांति) का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
मकर संक्रांति और अन्य त्योहारों में अंतर
| विशेषता | मकर संक्रांति | अन्य हिंदू पर्व |
|---|---|---|
| आधार | सूर्य (Solar) | चंद्रमा (Lunar) |
| तारीख | लगभग स्थिर | हर साल बदलती |
| उत्तरायण | हाँ | आवश्यक नहीं |
| कृषि से संबंध | बहुत गहरा | आंशिक |
एक लाइन में सरल उत्तर
मकर संक्रांति 14 जनवरी को इसलिए मानी जाती है क्योंकि यह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर आधारित सौर पर्व है। पृथ्वी के वास्तविक सौर वर्ष और कैलेंडर वर्ष के अंतर के कारण कभी-कभी यह 15 जनवरी को भी पड़ जाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
मकर संक्रांति की तारीख कोई परंपरागत अनुमान नहीं, बल्कि शुद्ध खगोलीय गणना पर आधारित है।
यही कारण है कि—
- यह चंद्र पर्व नहीं होते हुए भी
- हजारों वर्षों से लगभग एक ही तारीख पर मनाई जाती है
यह पर्व हमें प्रकृति, खगोल विज्ञान, कृषि और आध्यात्म—चारों से जोड़ता है।



