Sakat Chauth Vrat Katha in Hindi
संक्षेप
सकट चौथ व्रत कथा में भगवान श्रीगणेश की कृपा, श्रद्धा, संयम और कर्मफल का गहरा संदेश मिलता है। इस दिन गणेश जी की कथा के साथ-साथ देवरानी-जेठानी और सकट माता की कथा पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इन कथाओं के बिना सकट चौथ का व्रत अधूरा रहता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है।
सकट चौथ 2026 इस वर्ष 6 जनवरी 2026 को मनाई जा रही है।
सकट चौथ का महत्व
सकट चौथ माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। इस दिन प्रातः स्नान-पूजन, दिनभर उपवास, सायंकाल चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। श्रद्धालु गणेश जी को तिल-गुड़ से बने भोग अर्पित करते हैं। मान्यता है कि सच्चे भाव से किया गया व्रत संतान के कष्ट दूर करता है और परिवार में मंगल लाता है।
गणेश जी से जुड़ी कथा
एक बार भगवान गणेश बाल रूप में चुटकी भर चावल और चम्मच भर दूध लेकर पृथ्वी लोक में निकले। वे लोगों से खीर बनाने को कहते गए, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तभी एक गरीब बुढ़िया ने प्रेम से उनकी बात मानी और चूल्हे पर घर का सबसे बड़ा भगोना चढ़ा दिया।
गणेश जी के दिए चावल-दूध से पूरा भगोना भर गया। गणेश जी बोले—“अम्मा, खीर बन जाए तो मुझे बुला लेना।” इसी बीच बुढ़िया की बहू ने चुपके से खीर चख ली और एक कटोरा छिपा लिया। जब खीर तैयार हुई, बुढ़िया ने पुकारा—“आजा रे गणेशा, खीर खा ले।”
गणेश जी आए और बोले—“मैं खीर खा चुका हूँ।” बुढ़िया के पूछने पर उन्होंने कहा—“जब तेरी बहू ने खाई, तभी मेरा पेट भर गया।”
बुढ़िया ने क्षमा मांगी। गणेश जी ने शेष खीर नगर में बांटने और जो बचे उसे जमीन में दबाने को कहा। अगले दिन बुढ़िया की झोपड़ी महल बन चुकी थी और बर्तन सोने-जवाहरात से भरे थे।
शिक्षा: सच्ची श्रद्धा और निष्कपट भाव से की गई सेवा का फल अवश्य मिलता है।
देवरानी-जेठानी और सकट माता की कथा
एक नगर में देवरानी-जेठानी रहती थीं। देवरानी गरीब थी, पर गणेश जी की अनन्य भक्त। वह जेठानी के घर काम करती और जो बचता, वही घर ले जाती। उसका पति जंगल से लकड़ी काटकर बेचता था।
माघ मास में सकट चौथ आई। देवरानी ने व्रत रखा। धनाभाव में उसने तिल-गुड़ का तिलकुट बनाया, पूजा की और कथा सुनी। वह सोचकर जेठानी के घर काम पर गई कि शाम को चंद्र अर्घ्य देकर वहीं से लाया भोजन खाएगी।
शाम को जेठानी के घर किसी ने खाना नहीं खाया था, इसलिए जेठानी ने देवरानी को भोजन देने से मना कर दिया। देवरानी उदास होकर घर लौटी। बच्चे और पति भोजन की आस लगाए बैठे थे। कुछ न मिलने पर बच्चे रोने लगे, पति क्रोधित हो गया। देवरानी रोती-रोती गणेश जी का स्मरण करती हुई पानी पीकर सो गई।
उसी रात सकट माता बुढ़िया का रूप धरकर उसके स्वप्न में आईं। बोलीं—“भूख लगी है, कुछ खाने को दो।” देवरानी ने कहा—“घर में अन्न नहीं है, पूजा का बचा तिलकुट है, वही खा लो।”
सकट माता ने तिलकुट खाया और बोलीं—“अब शौच जाना है, कहाँ निपटूँ?” देवरानी ने कहा—“यह झोपड़ी खाली है, जहाँ चाहें।” फिर बोलीं—“अब पोंछूँ कहाँ?” देवरानी ने कहा—“मेरी साड़ी से।”
सुबह देवरानी उठी तो देखा—पूरा घर हीरों-मोतीयों से जगमगा रहा है। उस दिन वह काम पर नहीं गई। जेठानी ने बच्चों को बुलाने भेजा। बच्चों ने लौटकर बताया कि चाची का घर रत्नों से भरा है। जेठानी दौड़कर आई और कारण पूछा। देवरानी ने सब बता दिया।
जेठानी ने भी वैसा ही करने की सोची। उसने सकट चौथ पर तिलकुट बनाया। रात को सकट माता आईं। भूख पूछी तो जेठानी ने कहा—“छींके में फल-मेवे रखे हैं, जो चाहें खा लो।” निपटने-पोंछने को कहा तो बोली—“मेरे महल में कहीं भी।”
सुबह उठते ही घर में गंदगी और बदबू के सिवा कुछ न था।
शिक्षा: विनम्रता, त्याग और सच्चे भाव से किया गया दान ही फल देता है; अहंकार का अंत अशुभ होता है।
व्रत के नियम (संक्षेप में)
- प्रातः स्नान कर गणेश जी का ध्यान करें।
- तिल-गुड़, दूर्वा, मोदक अर्पित करें।
- दिनभर उपवास रखें, संध्या को चंद्र दर्शन कर अर्घ्य दें।
- गणेश जी और सकट माता की कथा अवश्य पढ़ें/सुनें।
निष्कर्ष
सकट चौथ केवल व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा और सदाचार का पर्व है। गणेश जी की कृपा और सकट माता की कथा हमें सिखाती है कि निष्कपट भक्ति से जीवन की कठिनाइयाँ दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
हे गणेश जी महाराज! जिस प्रकार आपने भक्तों को फल दिया, उसी प्रकार सभी श्रद्धालुओं पर अपनी कृपा बनाए रखें।
