पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा: संतान प्राप्ति के लिए सबसे श्रेष्ठ व्रत
पौष पुत्रदा एकादशी हिंदू धर्म में संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि और पारिवारिक सुख के लिए अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान श्री विष्णु (नारायण) को समर्पित होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत के समान संतान देने वाला कोई दूसरा व्रत नहीं है।
पुत्रदा एकादशी का महत्व
पुत्रदा एकादशी का अर्थ है – पुत्र प्रदान करने वाली एकादशी।
इस व्रत के प्रभाव से:
- निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है
- वंश की वृद्धि होती है
- पितृ ऋण और देव ऋण से मुक्ति मिलती है
- जीवन में यश, लक्ष्मी और ज्ञान की प्राप्ति होती है
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पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
एक समय महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रता पूर्वक प्रश्न किया—
“हे भगवान! आपने सफला एकादशी का माहात्म्य बताकर हम पर कृपा की। अब कृपया यह बताइए कि पौष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है, उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता की पूजा की जाती है?”
भगवान श्रीकृष्ण बोले—
“हे राजन! पौष शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान नारायण की पूजा की जाती है। इस संसार में पुत्रदा एकादशी के समान कोई दूसरा व्रत नहीं है। इसके पुण्य से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है। अब मैं तुम्हें इसकी पवित्र कथा सुनाता हूँ।”
राजा सुकेतुमान की कथा
भद्रावती नामक नगरी में राजा सुकेतुमान राज्य करता था। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। राजा के पास राज्य, धन, हाथी-घोड़े, मंत्री और वैभव सब कुछ था, परंतु उसे संतान सुख प्राप्त नहीं था।
निःसंतान होने के कारण राजा और रानी सदैव चिंता में डूबे रहते थे। राजा सोचता था—
“मेरे बाद मुझे पिंडदान कौन करेगा? बिना पुत्र के मैं पितृ ऋण और देव ऋण कैसे चुका पाऊँगा?”
राजा के पितर भी पिंड की आशा में विलाप करते थे। इस चिंता ने राजा को भीतर से तोड़ दिया। वह जानता था कि जिस घर में पुत्र नहीं होता, वहाँ जीवन में अंधकार छाया रहता है।
वन में मुनियों से भेंट
एक दिन गहन चिंता में डूबा राजा घोड़े पर सवार होकर वन की ओर चला गया। उसने वहाँ अनेक पशु-पक्षी देखे — मृग, सिंह, व्याघ्र, हाथी, बंदर, उल्लू और गीदड़। वन के दृश्य देखते-देखते आधा दिन बीत गया।
प्यास से व्याकुल राजा को एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया, जहाँ कमल खिले थे और हंस-सारस विहार कर रहे थे। सरोवर के चारों ओर अनेक मुनियों के आश्रम थे।
राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ संकेत मानकर राजा ने मुनियों को दंडवत प्रणाम किया।
पुत्रदा एकादशी का रहस्य
मुनियों ने कहा—
“हे राजन! हम तुमसे प्रसन्न हैं। बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है?”
राजा ने पूछा—
“महाराज, आप कौन हैं और यहाँ किस कारण आए हैं?”
मुनि बोले—
“हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है। हम विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।”
यह सुनकर राजा ने करुण स्वर में कहा—
“महाराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे एक पुत्र का वरदान दीजिए।”
मुनि बोले—
“हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी का व्रत करो। भगवान विष्णु की कृपा से अवश्य ही तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।”
व्रत का फल
मुनियों के वचनों से प्रेरित होकर राजा ने उसी दिन पुत्रदा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया और द्वादशी के दिन पारण किया।
कुछ समय पश्चात रानी शैव्या ने गर्भ धारण किया और नौ महीने बाद एक तेजस्वी, शूरवीर और यशस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर एक उत्तम प्रजापालक राजा बना।
कथा का उपसंहार
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य संतान प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है, उसे अवश्य ही शुभ फल मिलता है। जो इस व्रत कथा को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।”
निष्कर्ष
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत संतान सुख, वंश वृद्धि और पारिवारिक कल्याण के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत जीवन की सबसे बड़ी कामना को पूर्ण करता है।



