Meru Trayodashi 2026: मेरु त्रयोदशी का धार्मिक महत्व
Highlights
- 16 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी मेरु त्रयोदशी
- प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण से जुड़ा है यह पर्व
- आत्मशुद्धि, तप और आंतरिक प्रगति का प्रतीक है यह तिथि
जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी को अत्यंत पवित्र, पुण्यकारी और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में मेरु त्रयोदशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि, यानी 16 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस तिथि का विशेष संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण कल्याणक से है।
मेरु त्रयोदशी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, तपस्या और पुण्य अर्जन का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन जैन समाज के श्रद्धालु उपवास, जप, ध्यान, दान और साधना के माध्यम से आत्मिक उन्नति का प्रयास करते हैं।
मेरु त्रयोदशी का धार्मिक महत्व
जैन परंपरा में मेरु पर्वत को उच्चता, स्थिरता और श्रेष्ठता का प्रतीक माना गया है। इसी कारण मेरु त्रयोदशी के दिन किए गए तप, व्रत और साधना को विशेष फलदायी माना जाता है।
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन साधक सांसारिक मोह-माया और इच्छाओं से दूर रहकर आत्मा की शुद्धि तथा पूर्व कर्मों के क्षय पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
मेरु त्रयोदशी की पूजा केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह आत्मिक अनुशासन, संयम और एकाग्रता का संदेश देती है। जैन मुनि और साधक इस दिन विशेष प्रार्थना, ध्यान और दान द्वारा आंतरिक शक्ति और आध्यात्मिक स्थिरता को बढ़ाने का प्रयास करते हैं।
कब और क्यों मनाई जाती है मेरु त्रयोदशी
मेरु त्रयोदशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः हर वर्ष जनवरी माह में पड़ती है। जैन धर्म में यह तिथि केवल पंचांग की गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध तीर्थंकरों के जीवन, उपदेश और निर्वाण से जुड़ा हुआ है।
मान्यता है कि इस दिन किए गए जप, तप, उपवास और दान का पुण्य सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है। यही कारण है कि जैन समुदाय के अनुयायी इस दिन विशेष व्रत रखते हैं और धर्म साधना में लीन रहते हैं।
जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी का संबंध
मेरु त्रयोदशी का जैन धर्म में अत्यंत गहरा महत्व है। यह पर्व भगवान ऋषभदेव के निर्वाण और उनके द्वारा स्थापित अहिंसा, संयम और आत्मज्ञान के मार्ग का स्मरण कराता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान, तप और साधना से पाप कर्मों का क्षय होता है तथा साधक के जीवन में मानसिक शांति, स्थिरता और संतुलन का संचार होता है।
जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी को केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन अपनाने और जीवन को शुद्ध दिशा देने का अवसर माना गया है। यह पर्व साधक को आत्मिक शक्ति, एकाग्रता और धर्म मार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है।
मेरु त्रयोदशी पूजा विधि (संक्षेप में)
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा या चित्र के समक्ष ध्यान और प्रार्थना करें
- जप, ध्यान, उपवास और स्वाध्याय करें
- दान-पुण्य एवं जरूरतमंदों की सहायता करें
- संयम, मौन और अहिंसा का पालन करें
निष्कर्ष
Meru Trayodashi 2026 जैन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है, जो भगवान ऋषभदेव के निर्वाण कल्याणक से जुड़ा हुआ है। यह तिथि श्रद्धालुओं को आत्मशुद्धि, तपस्या और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।



