Sakat Chauth Vrat Katha In Hindi – साहूकार और साहूकारनी की तिलकुट वाली प्रेरक कहानी
सकट चौथ व्रत कथा
सकट चौथ का व्रत भारतीय परंपरा में माताओं द्वारा रखा जाने वाला एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण उपवास माना जाता है। इस व्रत को विशेष रूप से संतान की मंगलकामना से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि जो महिलाएं सच्चे मन और श्रद्धा के साथ सकट चौथ का व्रत करती हैं, उनकी संतान को दीर्घायु, सफलता और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अधिकतर माताएं यह व्रत निर्जला रखती हैं। अर्थात इस दिन अन्न और जल का त्याग किया जाता है। शाम के समय शुभ मुहूर्त में भगवान श्री गणेश की पूजा होती है और सकट चौथ की कथा सुनी जाती है। रात्रि में चंद्रदेव को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस पूरे विधान में कथा श्रवण को सबसे अहम हिस्सा माना गया है।
सकट चौथ की प्रचलित व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है, एक नगर में एक धनवान साहूकार और उसकी पत्नी साहूकारनी निवास करते थे। उनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनका मन कभी भी धार्मिक कार्यों में नहीं लगता था। वे न तो पूजा-पाठ करते थे और न ही दान-पुण्य में रुचि लेते थे। इसी कारण उनके जीवन में एक बड़ा अभाव था – उनके घर कोई संतान नहीं थी।
एक दिन साहूकारनी किसी काम से अपनी पड़ोसन के घर गई। वहां उसने देखा कि पड़ोसन बड़े भक्तिभाव से सकट चौथ की पूजा कर रही है और व्रत कथा सुना रही है। यह दृश्य साहूकारनी के लिए बिल्कुल नया था।
उसने आश्चर्य से पूछा – “तुम यह क्या कर रही हो?”
पड़ोसन ने उत्तर दिया – “आज सकट चौथ का व्रत है। मैं भगवान गणेश की पूजा करके उनकी कथा का पाठ कर रही हूं।”
तब साहूकारनी ने सकट चौथ के बारे में विस्तार से जानकारी ली। पड़ोसन ने उसे बताया कि इस व्रत के प्रभाव से अन्न, धन, सौभाग्य और पुत्र सुख की प्राप्ति होती है। यह सुनकर साहूकारनी के मन में भी व्रत करने की इच्छा जाग उठी।
उसने संकल्प लिया कि यदि उसे संतान सुख प्राप्त होता है, तो वह सवा सेर तिलकुट बनाकर भगवान को अर्पित करेगी और हर साल यह व्रत विधिपूर्वक करेगी।
बढ़ती इच्छाएं और भूला हुआ संकल्प
भगवान श्री गणेश की कृपा से कुछ ही समय बाद साहूकारनी गर्भवती हो गई। इससे उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गये, उसकी इच्छाएं भी बढ़ने लगीं। उसने भगवान से कहा कि यदि उसके घर पुत्र का जन्म होता है, तो वह ढाई सेर तिलकुट चढ़ाएगी।
कुछ समय बाद उसके घर सचमुच एक सुंदर बालक ने जन्म लिया। इसके बाद भी उसने नया संकल्प लिया कि बेटे का विवाह हो जाने पर वह सवा पांच सेर का तिलकुट अर्पण करेगी। लेकिन दुर्भाग्य से, इतने सारे वचन लेने के बाद भी साहूकारनी ने एक भी बार तिलकुट बनाकर भगवान को भोग नहीं लगाया।
सकट देवता का क्रोध
वर्ष बीतते गए और उसका बेटा बड़ा हो गया। युवक का विवाह तय हो गया। नगर में खुशियों का माहौल था। लेकिन साहूकारनी द्वारा वचन पूरा न करने के कारण सकट देवता नाराज हो चुके थे।
जैसे ही विवाह का दिन आया, सकट देवता ने साहूकारनी के पुत्र को मंडप से उठाकर पीपल के वृक्ष पर बिठा दिया। वर अचानक गायब हो गया। बारातियों में हड़कंप मच गया। सभी लोग दूल्हे को खोजने लगे, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला।
अर्धब्यहि का रहस्य
जिस कन्या से साहूकार के बेटे का विवाह होने वाला था, वह गणगौर पूजा के लिए जंगल में दूब लेने जाती थी। तभी पीपल के पेड़ से आवाज आने लगी – “ओ मेरी अर्धब्यहि!” यह पुकार सुनकर कन्या भयभीत हो जाती थी। धीरे-धीरे वह कमजोर और बीमार पड़ने लगी।
कन्या ने अपनी मां को सारी बात बताई। मां ने जाकर देखा तो पाया कि पीपल पर बैठा वह व्यक्ति साहूकारनी का पुत्र ही था। युवक ने बताया कि उसकी मां ने सकट चौथ का व्रत और तिलकुट चढ़ाने का वचन लिया था, लेकिन उसे पूरा नहीं किया। इसी अपराध के दंडस्वरूप उसे यह कष्ट झेलना पड़ रहा है।
गलती का एहसास और गणेश कृपा
यह सुनकर कन्या की मां साहूकारनी के घर पहुंची और उससे सचाई पूछी। साहूकारनी को अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उसने तुरंत भगवान श्री गणेश से क्षमा याचना की और सच्चे मन से कहा कि यदि उसका बेटा सकुशल लौट आता है, तो वह ढाई मन तिलकुट बनाकर भगवान को भोग लगाएगी।
माता की सच्ची प्रार्थना से सकट देवता प्रसन्न हो गए। साहूकारनी के बेटे को पुनः विवाह मंडप में पहुंचा दिया गया। सभी ने राहत की सांस ली और विवाह समारोह धूमधाम से संपन्न हुआ।
कथा का संदेश
विवाह के बाद साहूकारनी ने अपने वचन अनुसार तिलकुट बनाकर भगवान को अर्पित किया और प्रतिवर्ष सकट चौथ का व्रत रखने लगी। उसने संकल्प लिया कि अब वह कभी भी अपने बोले हुए वचन को अधूरा नहीं छोड़ेगी।
इस कथा का सार यही है कि –
श्रद्धा के साथ लिया गया संकल्प हमेशा पूरा करना चाहिए। भगवान गणेश भक्ति, विश्वास और सत्यनिष्ठा से ही प्रसन्न होते हैं।
अंत में सभी भक्त प्रार्थना करते हैं:
“हे सकट चौथ भगवान! जिस तरह आपने साहूकारनी को उसके बेटे-बहू से मिलवाया, वैसे ही इस कथा को पढ़ने और सुनने वालों का भी कल्याण करें।”
